5 मुख्य देसी मुर्गो की नस्ले

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पशुपालन-देसी मुर्गो की नस्ले

भारत में मुर्गी उत्पादन एक बहु अरब डॉलर का उद्योग है। भारतीय पोल्ट्री उद्योग पिछले एक दशक में 14% की वार्षिक दर से बढ़ा है और अगले दशक में इसी तरह की दर से बढ़ने की उम्मीद है।

भारतीय मुर्गी उद्योग मुख्य रूप से अंडा उत्पादन पर केंद्रित है, जिसमें कुल उत्पादन का 10% से भी कम चिकन मांस उत्पादन होता है।

भारत में पोल्ट्री मांस का उत्पादन पिछले एक दशक में काफी बढ़ा है, लेकिन यह अभी भी कुल उत्पादन का 10% से भी कम है।

पोल्ट्री और पोल्ट्री उत्पाद भारत में खपत होने वाले सभी मांस का 60% हिस्सा बनाते हैं। मुर्गी पालन सभ्यता की शुरुआत से ही आसपास रहा है। आधुनिक युग में, पोल्ट्री फार्म छोटे परिवार के खेतों से लेकर कारखाने के खेतों तक एक समय में 100,000 से अधिक पक्षियों के साथ बड़े हो गए हैं।

मुर्गी पालन का लाभ यह है कि यह मांस का उत्पादन करने का एक कम लागत वाला तरीका है क्योंकि इसमें अन्य प्रकार के पशुओं की तुलना में कम फ़ीड की आवश्यकता होती है जबकि आपको बड़ी संख्या में अंडे या मांस मिल जाता है। इसे अधिक जगह की भी आवश्यकता नहीं होती है जो इसे छोटे पैमाने के किसानों के लिए एक आदर्श रूप बनाती है।

भारत मे कई प्रकार के देसी मुर्गों की नस्ले पाई जाती है, जिसमे से मुख्य निम्न है –

1. असिल ( Aseel या Asil )-

असिल नामक मुर्गे की प्रजाति कुछ पहली प्रजातियों मे से एक है जिसका मुख्य बसेरा भारत और उसके पड़ोसी देश पाकिस्तान व बांग्लादेश है। इसे याकूब, नुरी और चीता जैसे नामों से भी जाना जाता है।

इस प्रजाति को पहले मनोरंजन के रूप मे प्रयोग किया जाता था क्युकी इस नस्ल की मुर्गीया व्यवहार से लड़ाकू होती है अतः इन्हे मुर्गों की लड़ाई के लिए इस्तेमाल किया जाता था। यह इतना प्रसिद्ध था के अब लड़ने वाली सारी नस्लों को सामान्यतया असिल ही कहा जाने लगा।

नर मुर्ग वजन मे चार किलो का होता है जबकि मादा का वजन दो से ढाई किलो तक का होता है। इस नस्ल के मुर्गे ज्यादातर लाल या भूरे रंग के होते है पर असिल नस्ल की विविध किस्म है जो कई रंगों मे पाई जाती है।

एक स्वस्थ असिल मुर्गी एक साल मे लगभग 60-70 अंडे देती है। और वह जन्म से 6.5 माह से ही अंडे देना शुरू कर देती है। क्युकी असिल का माँस बहुत लोकप्रिय है इसीलिए इसके अंडे को लोग खाने या बेचने से ज्यादा उसको हैच करना पसंद करते है। 

2. कड़कनाथ (Kadaknath)

कड़कनाथ मुर्गा जिसको कालीमासी भी कहा जाता है की उत्पत्ति मूलतया मध्यप्रदेश के आदिवासी जंगलों से हुई है। मध्यप्रदेश का झाबुआ नामक जिला कड़कनाथ मुर्गे की वजह से प्रसिद्ध है।

सारी नस्लों मे कड़कनाथ मुर्गे को पहचानना बहुत ही आसान है क्युकी कड़कनाथ मुर्गे का रंग पूरी तरह काला होता है। यहाँ तक की इसके माँस का रंग भी काला होता है। इस नस्ल के मुर्गे के माँस को बहुत पसंद किया जाता है। इस नस्ल के काले रंग का कारण इनमे मिलेनिन की अधिक मात्रा मे पाया जाना होता है ।

कड़कनाथ के मीट को GI टैग के लिए भारत सरकार द्वारा मंजूर किया गया है। GI टैग के माध्यम से हम क्षेत्रीय प्रोडक्टस को चिन्हित करते है।

कड़कनाथ नस्ल के नर का वजन 1.8 से 2 किलोग्राम होता है और मादा मुर्गी का वजन लगभग 1.5 किलोग्राम तक होता है। असिल की तरह कड़कनाथ मुर्गी भी एक साल मे लगभाग 60 से 70-75 अंडे देती है।

देसी मुर्गों की नस्ले
कड़कनाथ मुर्गा

3. ग्रामप्रिया (Grampriya)

भारत मे शहरी और ग्रामीण इलाकों मे अंडों के उत्पादन मे बहुत असामान्यता है, शहरी इलाकों मे माँस और अंडों की उपलब्धता ग्रामीण इलाकों के मुकाबले काही ज्यादा है।  इस असामान्यता को ध्यान मे रख कर ही ग्रामप्रिया नस्ल की उत्पत्ति हुई जो की एक क्रॉस ब्रीड है।

जिसकी उत्पत्ति भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-Directorate of Poultry Research जो की हैदराबाद मे स्थित है द्वारा की गई है। यह प्रोजेक्ट भारत सरकार द्वारा ही आयोजित किया गया था।

एक ग्रामप्रिया मादा  जन्म से 175 दिनों के बाद अपना पहला अंडा देने के लिए तैयार हो जाती है जबकि 1.5 साल मे एक मादा 200 से लेकर 230 अंडे तक दे सकती है जो की बाकी सारी देसी नस्लों से संख्या मे बहुत ज्यादा है।

संस्था का दावा है की ग्रामप्रिया नस्ल की मुरगियो मे साधारण बीमारियों से लड़ने की प्रतिरोधी क्षमता अन्य नस्लों की तुलना मे ज्यादा होती है जिससे यह ज्यादातर माहौल मे ढल जाती है व थोड़े कम पोषण के वावजूद इसके अंडे देने की क्षमता पर प्रभाव नहीं पड़ता।

4. चिटागोंग या मलय (Chittagong or Malay)

चिटागोंग नस्ल के मुर्गे अपने लंबी गार्डन से पहचाने जाते है, आकार मे ये मुर्गे की सबसे बड़ी नस्लों मे से एक है। एक नर मुर्गे की उचाई लगभग 2.5 फुट तक होती है, असिल नस्ल की तरह ये नस्ल भी एक दूसरे के प्रति अकरात्मक होते है।   

चिटागोंग नस्ल की उत्पत्ति भारतीय उप महाद्वीप मे है पर अब इसका पालन यूरोप व अमेरिका मे भी किया जाता है। चिटागोंग नस्ल के नर मुर्गे का वजन 4 से 5 किलोग्राम होता है और मादा मुर्गी का वजन 3.5 किलोग्राम तक होता है। इस नस्ल को  माँस और अंडे दोनों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। एक वयस्क मादा एक साल मे 70 से 120 अंडे तक देती है।

5. वनराजा (Vanaraja)

ग्रामप्रिया की तरह वनराजा नस्ल को भी भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद -Directorate of Poultry Research ने भारत सरकार के संरक्षण मे बनाया है। वनराजा को माँस और अंडे दोनों के लिए उपयोग मे लेते है। इस  नस्ल की मुर्गीया भी साधारण बीमारियों की प्रतिरोधी होती है और कम पोषण के बाद भी बहुत तेजी से बढ़ती है व अंडे देती है।

वनराजा नस्ल के नर 2.5 से 3 किलोग्राम व मुरगिया 2 से 2.2 किलोग्राम तक के होते है। मादा जन्म से 175 दिनों के बाद ही अंडे देने के लिए तैयार हो जाती है और एक साल मे औसतन 100 से 110 अंडे देती है। इस नस्ल की मुर्गियों के अंडों का रंग घरेलू मुर्गियों के अंडे से काफी मिलता जुलता है।

 भारत मे पाई जाने वाली देसी मुर्गों की नस्ले मुख्य तौर पर इस लेख मे बताई गई है लेकिन हमारे देश मे और भी कई नसले और क्रॉस ब्रीड नसले पाई जाती है जिसमे कई विविधता है। कुछ अन्य मुख्य नसले

झारसिम- मुख्यातया झारखंड मे पाई जाती है। एक साल मे मादा 150 से 170 अंडे तक देती है।

स्वरनाथ- मुख्यातया कर्नाटक मे पाई जाती है

कामरूप-  मुख्यातया असम मे पाई जाती है|

हमें आशा है के लेमन ग्रास की खेती से जुड़ा यह लेख आपको पसंद आया होगा अन्य जानकारी के लिए आप हमारे यूट्यूब चैनल देसी किसान पर इससे जुड़ी सारी जानकारी विस्तार से प्राप्त कर सकते हैं|

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रेफ : https://fao-dadis-breed-detail.firebaseapp.com/?country=IND&specie=Chicken&breed=Aseel

Picsabay : jayartin / 7 images

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