रागी की पूर्ण जानकारी : खेती, इतिहास व इसके लाभ

रागी

रागी (Ragi) एक पूर्ण पौष्टिक अनाज है जो भारतीय उपमहाद्वीप में पाया जाता है। यह अक्सर हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में उगाया जाता है। रागी विभिन्न पोषक तत्वों और गुणों से भरपूर होता है जो हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। इस लेख में हम रागी के विभिन्न पहलुओं, इसके लाभों और आहारिक महत्व के बारे में चर्चा करेंगे।

रागी का इतिहास

रागी एक महत्वपूर्ण अनाज है जिसे भारतीय उपमहाद्वीप में प्रमुखतः खाद्यान्न के रूप में उपयोग किया जाता है। रागी, जिसे मध्यप्रदेश में मंडुआ और मराठी में नाचणी के नाम से भी जाना जाता है, एक खाद्यान्न अनाज है जिसे संकरधारी महिनों की उगाई जाती है। इसका वैज्ञानिक नाम ‘इलेउसाइन कोराकाना’ है।

इसका इतिहास संस्कृति की गहरी जड़ों में समाया हुआ है। यह अनाज बहुत प्राचीन समय से भारतीय उपमहाद्वीप में उगाया जाता आया है और इसका उपयोग खाद्यान्न के रूप में, पशुपालन में और भोजन के तत्व के रूप में किया जाता है।

इसका प्रमुख उद्भव स्थान दक्षिणी अफ्रीका माना जाता है, जहां इसे सदियों से पहले से ही उगाया जाता था। इसके बाद यह उत्तरी भारत में फैला और आज यह भारत के अनेक हिस्सों में प्रमुखतः उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल में उगाया जाता है।

रागी को देशभर में बहुत सारे नामों से जाना जाता है। इसका उपयोग भारतीय खाद्य पदार्थों के रूप में जैसे कि रोटी, दोसा, इडली, उपमा, केक, पुड़ी आदि में किया जाता है। रागी का सेवन शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी बहुत लाभदायक होता है, क्योंकि यह प्रोटीन, फाइबर, कैल्शियम, आयरन और विटामिन ई का अच्छा स्रोत है।

रागी की खेती क्यों जरूरी है?

रागी की खेती का महत्व विभिन्न कारणों से है। पहला कारण यह है कि यह एक पूर्ण आहार है और कई पोषक तत्वों का उच्च स्तर प्रदान करती है। यह ग्लूटेन-मुक्त होती है, जिसके कारण व्यक्ति जो ग्लूटेन इंटॉलरेंट होते हैं, उन्हें यह अनाज खा सकते हैं। दूसरा कारण यह है कि इसकी उच्च उपज दर है, जिससे किसानों को मजबूत आर्थिक रूप से लाभ होता है। इसके अलावा, यह कई तरह की मिट्टियों में उगाई जा सकती है और सूखे क्षेत्रों में भी अच्छी फसल देती है।

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रागी की खेती के लिए मिट्टी का चयन

रागी की खेती के लिए मिट्टी का चयन एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। निम्नलिखित तत्वों को ध्यान में रखकर मिट्टी का चयन किया जाता है:

  • वातावरणीय स्थिति: इसकी खेती के लिए मिट्टी का चयन वातावरणीय स्थिति के अनुसार करना चाहिए। मिट्टी को धूप में नहीं रखना चाहिए और अधिक नमी वाली भूमि भी नहीं उचित होती है।
  • ड्रेनेज क्षमता: इसके लिए मिट्टी का चयन ऐसी करें जो अच्छी ड्रेनेज क्षमता वाली हो। मिट्टी का पानी को अच्छी तरह से सोख सकना चाहिए ताकि पानी जमा नहीं हो और मूल को नुकसान न हो।
  • पीएच और मूल्यों का स्तर: इसकी उचित विकास के लिए मिट्टी का पीएच और मूल्यों का स्तर सही होना चाहिए। रागी की खेती के लिए मिट्टी का पीएच स्तर 6.0 से 7.5 के बीच होना चाहिए।
  • पोषक तत्वों की उपलब्धता: इसकी उचित विकास के लिए मिट्टी में पोषक तत्वों की उचित उपलब्धता होनी चाहिए। मिट्टी में आवश्यक खनिजों की मात्रा, जैसे कैल्शियम, पोटेशियम, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, और मैग्नीशियम, उचित होनी चाहिए।

रागी की खेती के लिए बीजों का चयन

रागी की खेती के लिए उचित बीजों का चयन करना बहुत महत्वपूर्ण है। निम्नलिखित तत्वों को ध्यान में रखकर बीजों का चयन किया जाता है:

जाति चयन: रागी की खेती के लिए जाति का चयन करते समय क्षेत्र के जलवायु, मौसम, और स्थानीय उपजाऊता को ध्यान में रखना चाहिए। विभिन्न जातियों में पौधों की विकासशीलता, रोग प्रतिरोध, उत्पादकता, और विपणन महत्वपूर्ण होते हैं।

बीज की गुणवत्ता: उचित बीजों का चयन करते समय उनकी गुणवत्ता पर ध्यान देना चाहिए। बीजों को स्थिरता, विकास शक्ति, उत्पादकता और रोग प्रतिरोध के माध्यम से मापा जाता है। आपको विश्वसनीय और उच्च गुणवत्ता वाले बीजों का चयन करना चाहिए।

प्राकृतिक प्रतिरोधकता: रागी की खेती के लिए बीजों का चयन करते समय उनकी प्राकृतिक प्रतिरोधकता पर ध्यान देना चाहिए। आपको प्रतिरोधी प्रकार के साथ बीजों का चयन करना चाहिए, जिससे पौधों को रोगों और कीटों से संरक्षण मिले।

पूर्व सत्यापन: अंतिम चरण में, बीजों का चयन करने से पहले उनकी पूर्व सत्यापन करना आवश्यक है। इसके लिए सत्यापित कम्पनीयों या कृषि विश्वविद्यालय से सत्यापन किए गए बीजों का ही चयन करें।

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रागी की खेती में समय-सारणी

रागी की खेती में समय-सारणी निम्नलिखित रूप में हो सकती है:

  1. बीजों की बुवाई: रागी की खेती की शुरुआत बीजों की बुवाई के साथ होती है। यहां निम्नलिखित समय-सारणी का पालन करें:
    • शीतकालीन क्षेत्र: नवंबर-दिसंबर महीने में बुवाई करें।
    • उष्णकालीन क्षेत्र: मई-जून महीने में बुवाई करें।
  2. पौधों की देखभाल: बीजों की बुवाई के बाद, पौधों की देखभाल करनी चाहिए। इसमें निम्नलिखित कार्रवाई शामिल हो सकती है:
    • समय समय पर पानी की पूर्ति करें।
    • खरपतवार, रोग और कीटों का नियमित नियंत्रण करें।
    • उर्वरकों की उचित मात्रा में उपयोग करें।
  3. पकावत: इसके पौधों का पकावत करने के लिए उचित समय-सारणी का पालन करें।
    • समय समय पर पौधों का मूल्यांकन करें और योग्य पकावत के लिए सही समय पर कटाई करें।
    • पकावत का समय वर्षा और मौसम के अनुसार बदल सकता है, इसलिए स्थानीय विशेषज्ञों की सलाह लें।
  4. फसल कटाई: इसकी पूरी पकावत के बाद, फसल को कटने का समय आता है। यहां निम्नलिखित समय-सारणी का पालन करें:
    • शीतकालीन क्षेत्र: फरवरी-मार्च महीने में कटाई करें।
    • उष्णकालीन क्षेत्र: अक्टूबर-नवंबर महीने में कटाई करें।

यदि संभावना हो, तो स्थानीय कृषि विशेषज्ञों से सलाह लें और स्थानीय जलवायु की शर्तों के अनुसार समय-सारणी तैयार करें। इससे आपको उच्च उत्पादकता और सफलता की सुनिश्चितता मिलेगी।

रागी

रागी की खेती में खेतीबाड़ी की तकनीकें

रागी की खेती में कुछ महत्वपूर्ण खेतीबाड़ी तकनीकें हैं, जिन्हें निम्नलिखित रूप में विवरण दिया गया है:

बुवाई तकनीक: इसके बीजों की बुवाई धानी की खेती की तरह की जाती है। बीजों की बुवाई के लिए छोटे-छोटे खेती की ऊंचाई पर खरीफ मौसम में खुरपी का उपयोग किया जाता है। बीजों की गहराई 2 सेंटीमीटर तक होनी चाहिए।

खेत संचालन: इसकी खेती में समय समय पर खेत संचालन करना महत्वपूर्ण होता है। इसमें निम्नलिखित कार्रवाई शामिल हो सकती है:

समय समय पर पानी की पूर्ति करें और समय-सारणी के अनुसार सिंचाई करें।
खरपतवार, रोग और कीटों का नियमित नियंत्रण करें।
पोषक तत्वों की उचित मात्रा में खाद दें।
खेत में श्रमिकों की उचित प्रबंधन करें और कार्यों की सुविधा के लिए उपयुक्त औजारों का उपयोग करें।


रोग और कीट प्रबंधन: इसकी खेती में रोग और कीटों का प्रबंधन महत्वपूर्ण है। इसके लिए निम्नलिखित कार्रवाई करें:

संक्रमण से बचाव के लिए स्वच्छ और स्वच्छ खेतों का चयन करें।
फसल के विभाजन को बचाने के लिए फसलों के बीच सुरंग बांधें।
संक्रमण और कीटों के लिए जैविक और रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग करें।

रागी की प्रमुख खासियतें

  1. पौष्टिकता: इसमें ऊष्माग्राही आयरन, कैल्शियम, प्रोटीन, फाइबर, विटामिन और मिनरल्स आदि पाए जाते हैं। इसलिए यह शारीरिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत गुणकारी होती है।
  2. ग्लूटेन शून्य: यह ग्लूटेन-मुक्त अनाज है, जिसे सेलियक रोग के मरीजों के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जाता है।
  3. उच्च एंटीऑक्सिडेंट: इसमें उच्च मात्रा में एंटीऑक्सिडेंट्स होते हैं जो शरीर को मुक्त कणिकाओं से बचाने में मदद करते हैं।;
  4. मधुमेह प्रबंधन: यह ग्लिसीमिक इंडेक्स में कम होती है जिसके कारण यह मधुमेह के प्रबंधन में मदद करती है।
  5. दिल के लिए लाभकारी: इसमें उच्च मात्रा में फाइबर होता है, जो हृदय स्वास्थ्य को सुधारने में मदद करता है। इसके सेवन से कोलेस्ट्रॉल का स्तर नियंत्रित रहता है और हृदय संबंधी बीमारियों के खतरे को कम करता है।
  6. पाचन क्षमता: इसमें पाचन क्षमता को बढ़ाने वाले एंजाइम्स मौजूद होते हैं, जो आहार को आसानी से पचाने में मदद करते हैं।
  7. ताकतवर मस्तिष्क: इसमें विटामिन बी की अच्छी मात्रा होती है, जो मस्तिष्क स्वास्थ्य को बढ़ाने में मदद करती है और याददाश्त को सुधारती है।

रागी के आहारिक महत्व

पौष्टिकता: इसमें ऊष्माग्राही आयरन, प्रोटीन, कैल्शियम, फाइबर, विटामिन और मिनरल्स आदि मौजूद होते हैं। इसके सेवन से हमें ऊर्जा मिलती है और शारीरिक पोषण सुनिश्चित होता है।

वजन कम करने में सहायक: इसमें फाइबर की अच्छी मात्रा होती है, जो भोजन को अच्छी तरह से पचाने में मदद करती है और बढ़े हुए भोजन के अपच को कम करती है। यह वजन कम करने में सहायक होती है और साथ ही भूख को नियंत्रित रखने में मदद करती है।

डायाबिटीज के प्रबंधन में सहायक: इसको खाने से खाली पेट ग्लूकोज का स्तर धीमा होता है, जिसके कारण यह मधुमेह के प्रबंधन में सहायक होती है। इसके अलावा, यह इंसुलिन संबंधी प्रश्नों को नियंत्रित करने में मदद करती है।

हड्डियों का स्वास्थ्य: इसमें कैल्शियम, मैग्नीशियम और पोटेशियम की अच्छी मात्रा होती है, जो हड्डियों को मजबूत और स्वस्थ रखने में मदद करती है।

डाइजेशन को सुधारती है: इसके सेवन से पाचन प्रक्रिया सुधारती है और अपच के लक्षणों को कम करती है। इसके कारण यह पेट संबंधी समस्याओं को दूर करने में मदद करती है।

प्रश्नों का समाधान

रागी की प्रमुख कीट-रोग समस्याएं कौन सी हैं?

रागी की प्रमुख कीट-रोग समस्याएं में लूटी जूआ, रागी का कीट, रागी का पतंगा, और फंगल संक्रमण जैसे रोग शामिल हो सकते हैं। इनका प्रबंधन करने के लिए कीटनाशकों का उपयोग और समय-समय पर फसल की समीक्षा आवश्यक होती है।

रागी की फसल कब पकती है और कैसे पहचानें?

रागी की फसल आमतौर पर 90 से 120 दिनों में पक जाती है। फसल पकने की पहचान करने के लिए पौधों की ऊंचाई, पत्तों का रंग, अनाज की धान और बाल और छिलके की परीक्षा की जा सकती है। अगर ये संकेत प्रकट होते हैं, तो फसल पकी हुई मानी जाती है।

रागी की सिंचाई के लिए सबसे उपयुक्त सिस्टम कौनसा है?

रागी की सिंचाई के लिए बूंद सिंचाई (ड्रिप आईरिगेशन) सिस्टम सबसे उपयुक्त होता है। इसके माध्यम से जल की बचत होती है और पानी की आपूर्ति समय पर होती है, जिससे फसल की उत्पादकता में सुधार होता है।

इस लेख में हमने रागी के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त की है। यह हमारे शरीर के लिए एक पूर्ण आहार स्रोत है जिसमें पोषक तत्वों की अच्छी मात्रा होती है। इसका सेवन करने से हमें ऊर्जा मिलती है, वजन कम होता है, पाचन क्रिया सुधारती है, और रोगों से बचाव होता है। तो अपने आहार में इसको शामिल करें और इसके लाभों का आनंद लें।

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